आज हम हमारे देश के एक ऐसे वैज्ञानिक के बारे में बताएँगे जो भारतीय विज्ञान का एक चमकता सितारा था। उसकी शोध का अंदाजा आप इसी चीज से लगा सकते है की उसके समय वो एक मात्र और एशिया का पहला नॉबेल पुरस्कार विजेता वैज्ञानिक था। विश्व का कोई भी ऐसा क्षेत्र बाकी नही रहा है जहाँ उसकी शोध का उपयोग ना होता हो।
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ऐसा था बचपन और शिक्षा
दोस्तो, हम बात कर रहे है डॉ चंद्रशेखर वेंकट रामन की। ये नाम हर भारतीय विद्यार्थी के मुँह में जरूर होगा। सामान्य परिवार में जन्में सी.वी रामन बहुत ही तीव्र बुद्धि के धनी थे। उसके पिता भौतिकी में बहुत ही रुचि रखते थे और खुद भौतिकी के प्राध्यापक भी थे। छोटे रामन जब ये सब देखते तो उसको भी इन सबमे गज़ब का आनंद मिलता आखिर पिता की राह पर चलते उसने सिर्फ 19 साल की उम्र में ही अनुस्नातक की पढ़ाई पूरी कर ली और कलकत्ता विश्वविद्यालय में बतौर प्राध्यापक कार्य शुरू किया।
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रामन का पहला सफर
विश्वमें जहा कही भी विज्ञान की सभा या परिषद होती तो वो जाने को उत्सुक रहते एक बार विदेशमें हो रही ऐसी ही सभा के लिए उसे कलकत्ता से प्रतिनिधि के रूपमें भेजा गया। जहाज के सफर के दौरान उसने सोचा कि आखिर समुद्र का पानी नीला ही क्यों दिखता है? बेशक ये पूर्व धारणाओं के अनुसार निले आकाश का प्रतिबिंब तो हो ही नही सकता। रामन की इस जिज्ञाषा ने उसे लगातार सात साल तक प्रयोगशाला में खिंचे रखा। सन 1928 में दुनिया को बदल देने वाली शोध के साथ वो सामने आए जो विश्व में रामन असर के नाम से प्रख्यात है।
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ये थी रामन की शोध
इस सिद्धांत के अनुसार जब किसी ठोस चीज पर निश्चित आवृति के तरंगों को आपात किया जाता है और उसे वापिस ग्रहण करे, तो हमे मूल आवृति जिसे रेले आवृति कहते है उसके साथ दो अन्य ऐसे तरंग भी प्राप्त होते है जिसे स्टोक्स और एन्टी स्टोक्स कहते है, जो मूल आवृति से कम तीव्र और ज्यादा तीव्र होते है। ये तरंग बहुत ही संवेदनशील होते है। और हर दूसरी चीज से निकलने वाले ये तरंग हमेंशा अनन्य होते है जो हर एक चीज को एक अलग ही पहचान देता है। रामन ने अपनी इस शोध को प्रतिपादित करने के लिए रामन स्पेक्ट्रोस्कोपी का आविष्कार भी किया था।
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यहां होता है रामन असर का उपयोग
दुनिया का कोई भी क्षेत्र आज बाकी नही है जहाँ रामन असर का उपयोग ना होता हो। एयरपोर्ट पर सुरक्षा के क्षेत्रमें, ड्रग्स जैसी नशीली चीजो की परख में, मेडिकल क्षेत्र में, रसायन विज्ञान में पदार्थो के अन्तरिम बंधारण और उसकी रचना की पुख्ता जानकारी के लिए, अणुओ के आकार और उसकी रचना संबंधित जानकारी में तथा फोरेंसिक जांच में गुनाहों की गुत्थियों को सुलझने के लिए रामन असर का उपयोग किया जाता है। इस सभी चीजों के लिए उसे सन 1930 में सर्वोच्च सम्मान नोबेल पुरस्कार दिया गया था।
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great Indian scientist...
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